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शान्ति पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
कौस्तुभेन उरःस्थेन मणिनाभिविराजितम् |  १५   क
उद्यतेवोदय़ं शैलं सूर्येणाप्तकिरीटिनम् |  १५   ख
नौपम्यं विद्यते यस्य त्रिषु लोकेषु किञ्चन ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति