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शान्ति पर्व
अध्याय ४५
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जनमेजय़ उवाच
भगवान्वा हृषीकेशस्त्रैलोक्यस्य परो गुरुः |  २   क
ऋषे यदकरोद्वीरस्तच्च व्याख्यातुमर्हसि ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति