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शान्ति पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
कृपाय़ च महाराज गुरुवृत्तिमवर्तत |  ८   क
विदुराय़ च धर्मात्मा पूजां चक्रे यतव्रतः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति