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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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नारद उवाच
ततः कदाचिद्गङ्गाय़ाः कच्छे स नृपसत्तमः |  १८   क
गङ्गाय़ामाप्लुतो धीमानाश्रमाभिमुखोऽभवत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति