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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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नारद उवाच
समाविद्धे वने तस्मिन्प्राप्ते व्यसन उत्तमे |  २१   क
निराहारतय़ा राजा मन्दप्राणविचेष्टितः |  २१   ख
असमर्थोऽपसरणे सुकृशौ मातरौ च ते ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति