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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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नारद उवाच
गच्छ सञ्जय़ यत्राग्निर्न त्वां दहति कर्हिचित् |  २३   क
वय़मत्राग्निना युक्ता गमिष्यामः परां गतिम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति