आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४५

वैशम्पाय़न उवाच

चिरस्य खलु पश्यामि भगवन्तमुपस्थितम् |  ३   क
कच्चित्ते कुशलं विप्र शुभं वा प्रत्युपस्थितम् ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति