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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुराणां च तदा महानार्तस्वरोऽभवत् |  ४०   क
पौराणां च महाराज श्रुत्वा राज्ञस्तदा गतिम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति