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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तःपुरेषु च तदा सुमहान्रुदितस्वनः |  ४२   क
प्रादुरासीन्महाराज पृथां श्रुत्वा तथागताम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति