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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्नुपरते शव्दे मुहूर्तादिव भारत |  ४४   क
निगृह्य वाष्पं धैर्येण धर्मराजोऽव्रवीदिदम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति