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सभा पर्व
अध्याय ४५
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दुर्योधन उवाच
सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीय़मानं निशाम्य च |  १६   क
अदृश्यामपि कौन्तेय़े स्थितां पश्यन्निवोद्यताम् |  १६   ख
तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति