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सभा पर्व
अध्याय ४५
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शकुनिरु उवाच
द्यूतप्रिय़श्च कौन्तेय़ो न च जानाति देवितुम् |  ३८   क
आहूतश्चैष्यति व्यक्तं दीव्यावेत्याह्वय़स्व तम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति