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सभा पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः संस्तीर्य रत्नैस्तामक्षानावाप्य सर्वशः |  ४७   क
सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदय़त मे शनैः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति