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सभा पर्व
अध्याय ४५
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धृतराष्ट्र उवाच
अशुभं वा शुभं वापि हितं वा यदि वाहितम् |  ५४   क
प्रवर्ततां सुहृद्द्यूतं दिष्टमेतन्न संशय़ः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति