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सभा पर्व
अध्याय ४५
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धृतराष्ट्र उवाच
मय़ि संनिहिते चैव भीष्मे च भरतर्षभे |  ५५   क
अनय़ो दैवविहितो न कथञ्चिद्भविष्यति ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति