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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
व्रह्मर्षे श्रूय़तां यत्ते मनसैतद्विवक्षितम् |  १५   क
नाय़ं केवलमर्त्यो वै क्षत्रिय़त्वमुपागतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति