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विराट पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
निशम्य यस्य विस्फारं व्यद्रवन्त रणे परे |  २०   क
पर्वतस्येव दीर्णस्य विस्फोटमशनेरिव ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति