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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
अहो नैनं भवान्वेत्ति पुराणमृषिसत्तमम् |  १७   क
शृणु मे वदतो व्रह्मन्योऽय़ं यच्चास्य कारणम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति