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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
यन्न शक्यं सुरैर्द्रष्टुमृषिभिर्वा महात्मभिः |  १९   क
तदाश्रमपदं पुण्यं वदरी नाम विश्रुतम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति