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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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ऋषिरु उवाच
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मय़ा |  ४५   क
त्वय़ि सर्वे स्म दृश्यन्ते सुरा व्रह्मादय़ोऽनघ ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति