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सभा पर्व
अध्याय ६३
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धृतराष्ट्र उवाच
तृतीय़ं वरय़ास्मत्तो नासि द्वाभ्यां सुसत्कृता |  ३३   क
त्वं हि सर्वस्नुषाणां मे श्रेय़सी धर्मचारिणी ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति