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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थेष्वाप्लुत्य पुण्येषु विपाप्मा विगतज्वरः |  ३४   क
राज्यं भोक्ष्यसि राजेन्द्र सुखी विगतकल्मषः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति