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वन पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
गिरिदुर्गेषु हि सदा देशेषु विषमेषु च |  ३६   क
वसन्ति राक्षसा रौद्रास्तेभ्यो रक्षेत्सदा भवान् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति