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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
दैवोपहतचित्तेन यन्मय़ापकृतं पुरा |  ५८   क
अनय़स्य फलं तस्य व्रूहि गावल्गणे पुनः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति