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विराट पर्व
अध्याय ४५
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अश्वत्थामो उवाच
द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षन्तुं पाण्डवोऽर्हति |  १४   क
दुःखाय़ धार्तराष्ट्राणां प्रादुर्भूतो धनञ्जय़ः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति