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सभा पर्व
अध्याय ५६
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विदुर उवाच
यश्चित्तमन्वेति परस्य राज; न्वीरः कविः स्वामतिपत्य दृष्टिम् |  ४   क
नावं समुद्र इव वालनेत्रा; मारुह्य घोरे व्यसने निमज्जेत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति