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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
एवं त्वामपि धर्मात्मन्प्रय़ाचेऽहं कृताञ्जलिः |  ५०   क
पृथिवीदानतुल्यं स्यादधिकं वा फलं विभो ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति