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उद्योग पर्व
अध्याय ४५
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सनत्सुजात उवाच
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो महात्मा; न दृश्यतेऽसौ हृदय़े निविष्टः |  २४   क
अजश्चरो दिवारात्रमतन्द्रितश्च; स तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति