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भीष्म पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
जवेनापततां तेषां भीष्मः शान्तनवो रणे |  ३१   क
पाञ्चाल्यं त्रिभिरानर्छत्सात्यकिं निशितैः शरैः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति