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भीष्म पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
स हताश्वाद्रथात्तूर्णं खड्गमादाय़ विद्रुतः |  ५२   क
वीभत्सोः स्यन्दनं प्राप्य ततः शान्तिमविन्दत ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति