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भीष्म पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
ततो भीष्मरथात्तूर्णमुत्पतन्ति पतत्रिणः |  ५३   क
यैरन्तरिक्षं भूमिश्च सर्वतः समवस्तृतम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति