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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा कर्म पार्थस्य द्रौणिराहवशोभिनः |  ११   क
अवाकिरद्रणे कृष्णं समन्तान्निशितैः शरैः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति