वन पर्व  अध्याय २५१

वैशम्पाय़न उवाच

दर्शनादेव हि मनस्तय़ा मेऽपहृतं भृशम् |  ४   क
तां समाचक्ष्व कल्याणीं यदि स्याच्छैव्य मानुषी ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति