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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
तेषां तु क्रोशतां श्रुत्वा भीतानां रणमूर्धनि |  ४२   क
धावतां च दिशो राजन्वित्रस्तानां समन्ततः |  ४२   ख
आर्तनादो महांस्तत्र प्रेतानामिव सम्प्लवे ||  ४२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति