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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
पश्य कृष्ण महावाहो भार्गवास्त्रस्य विक्रमम् |  ४६   क
नैतदस्त्रं हि समरे शक्यं हन्तुं कथञ्चन ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति