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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
सुतीक्ष्णं चोदय़न्नश्वान्प्रेक्षते मां मुहुर्मुहुः |  ४८   क
न च पश्यामि समरे कर्णस्य प्रपलाय़ितम् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति