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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनं चाव्रवीत्कृष्णो भृशं राजा परिक्षतः |  ५१   क
तमाश्वास्य कुरुश्रेष्ठ ततः कर्णं हनिष्यसि ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति