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कर्ण पर्व
अध्याय ४५
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अर्जुन उवाच
स संशय़ं गमितः पाण्डवाग्र्यः; सङ्ख्येऽद्य कर्णेन महानुभावः |  ६१   क
ज्ञातुं प्रय़ाह्याशु तमद्य भीम; स्थास्याम्यहं शत्रुगणान्निरुध्य ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति