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सभा पर्व
अध्याय ४८
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दुर्योधन उवाच
निचितं पर्वतेभ्यश्च हिरण्यं भूरिवर्चसम् |  ११   क
वलिं च कृत्स्नमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति