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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्याचचक्षे गन्धर्वो विश्वावसुरहं नृप |  ३८   क
प्राप्तो व्रह्मानुशापेन योनिं राक्षससेविताम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति