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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंय़तम् |  ३०   क
विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति