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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
पाशं तु वरुणो राजा वलवीर्यसमन्वितम् |  ४७   क
कृष्णाजिनं तथा व्रह्मा व्रह्मण्याय़ ददौ प्रभुः |  ४७   ख
समरेषु जय़ं चैव प्रददौ लोकभावनः ||  ४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति