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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा सर्वदैतेय़ा राक्षसा दानवास्तथा |  ५९   क
व्यद्रवन्त दिशः सर्वा भय़ोद्विग्नाः समन्ततः |  ५९   ख
अभ्यद्रवन्त देवास्तान्विविधाय़ुधपाणय़ः ||  ५९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति