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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
महिषं चाष्टभिः पद्मैर्वृतं सङ्ख्ये निजघ्निवान् |  ६५   क
त्रिपादं चाय़ुतशतैर्जघान दशभिर्वृतम् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति