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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
शक्त्यस्त्रस्य तु राजेन्द्र ततोऽर्चिर्भिः समन्ततः |  ६८   क
दग्धाः सहस्रशो दैत्या नादैः स्कन्दस्य चापरे ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति