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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
गोलाङ्गूलर्क्षसङ्घैश्च द्रवद्भिरनुनादितम् |  ७५   क
कुरङ्गगतिनिर्घोषमुद्भ्रान्तसृमराचितम् ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति