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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
विनिष्पतद्भिः शरभैः सिंहैश्च सहसा द्रुतैः |  ७६   क
शोच्यामपि दशां प्राप्तो रराजैव स पर्वतः ||  ७६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति