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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दैत्या विनिष्पेतुः शतशोऽथ सहस्रशः |  ७८   क
प्रदीप्तात्पर्वतश्रेष्ठाद्विचित्राभरणस्रजः ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति