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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
कमण्डलुर्ध्वजे यस्य शातकुम्भमय़ः शुभः |  ६   क
आचार्य एष वै द्रोणः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति