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शल्य पर्व
अध्याय ४५
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वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यगन्धमुपादाय़ ववौ पुण्यश्च मारुतः |  ८४   क
गन्धर्वास्तुष्टुवुश्चैनं यज्वानश्च महर्षय़ः ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति