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आदि पर्व
अध्याय ४६
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जनमेजय़ उवाच
केन दृष्टं श्रुतं चापि भवतां श्रोत्रमागतम् |  २७   क
श्रुत्वा चाथ विधास्यामि पन्नगान्तकरीं मतिम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति